Crime कार्यवाही

SC: ‘हमारे आदेश को फेल करने के लिए हत्यारोपी पर यूएपीए लगाया’, सुप्रीम कोर्ट ने मनीष राठौर मामले में छत्तीसगढ़ पुलिस को लगाई फटकार

उस अफसर को पेश करो, जिसने हमारा आदेश नहीं माना; कैसे लगाया UAPA? क्यों भड़क उठे मीलॉर्ड

राज्य सरकार की कार्रवाई पर जस्टिस ओका भड़क गए। उन्होंने कहा, यह मामला तो IPC की धारा 506 से जुड़ा है तो फिर एक अफसर ने इसमें UAPA कैसे लगा दिया?

न्यूज बस्तर की आवाज़/सुप्रीम कोर्ट में सोमवार (1 मार्च) को जस्टिस अभय एस. ओका और जस्टिस उज्जल भुयान की पीठ में छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले के एक मामले की सुनवाई हो रही थी, जिसमें अदालत ने पिछली सुनवाई यानी 2 जनवरी को याचिकाकर्ता को गिरफ्तारी से छूट दी थी लेकिन कोर्ट के आदेश को दरकिनार कर SDO ने UAPA लगाकर आरोपी को हिरासत में ले लिया था। सुप्रीम कोर्ट इस बात पर भड़क गया और उस अधिकारी को पेश करने का आदेश दिया है, जिसने UAPA लगाया था।

दरअसल, याचिकाकर्ता मनीष राठौर पर भारतीय दंड संहिता की धारा 506 (बी) के तहत आरोप दर्ज किए गए थे, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को गिरफ्तारी से छूट दी थी लेकिन जिला प्रशासन ने उस पर UAPA लगाकर उसे गिरफ्तार कर लिया था। मनीष राठौर बनाम छत्तीसगढ़ राज्य के मामले में सोमवार को याचिकाकर्ता की तरफ से पेश वकील ने अदालत से गुहार लगाई कि उसके मुवक्किल को न सिर्फ गिरफ्तार किया गया बल्कि पूरे शहर में घुमाया भी गया। वकील ने कहा कि उसके पास इस घटना की तस्वीरें भी हैं।

इस पर जस्टिस ओका राज्य सरकार पर भड़क गए। उन्होंने कहा, यह मामला तो IPC की धारा 506 से जुड़ा है तो फिर एक अफसर ने इसमें UAPA कैसे लगा दिया? बार एंड बेंच के मुताबिक, जस्टिस ओका ने कहा, “हमने 2 जनवरी 2025 के आदेश में 14 मई 2024 की तारीख वाली एफआईआर संख्या 54/24 में याचिकाकर्ता को गिरफ्तारी से बचाने के लिए एक अंतरिम आदेश पारित किया था। फिर इस केस में UAPA क्यों लगा दिया गया।”

दरअसल, राज्य सरकार ने याचिकाकर्ता के खिलाफ 29 जनवरी 25 को UAPA लगाकर उसे हिरासत में ले लिया था। कोर्ट ने राज्य सरकार की इस कार्रवाई पर भड़कते हुए कहा, “पहली नजर में ऐसा लगता है कि यह कार्रवाई इस कोर्ट द्वारा 2 जनवरी 2025 को पारित अंतरिम आदेश को विफल करने के लिए की गई है। इसलिए हम नारायणपुर जिले के एसडीओ को नोटिस जारी करते हैं और 28 फरवरी को इस कोर्ट में हाजिर होने का निर्देश देते हैं।” कोर्ट ने मामले में SDPO और SHO को भी नोटिस जारी किया है। सभी से अपने आचरण पर सफाई देने को कहा गया है।

बता दें कि याचिकाकर्ता के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 506बी के तहत एफआईआर संख्या 39/24 दर्ज की गई थी। उक्त एफआईआर के संबंध में याचिकाकर्ता को सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जमानत पर रिहा कर दिया गया था लेकिन 18 जनवरी 2025 को अनुमंडल पदाधिकारी जिला नारायणपुर ने सत्र न्यायाधीश को एफआईआर संख्या 39/24 में विधि विरुद्ध क्रियाकलाप निवारण अधिनियम (UAPA) की धारा 13(1) एवं विशेष जन सुरक्षा अधिनियम 2005 की धारा 8(5) जोड़ने के लिए आवेदन दिया था। उसके बाद फिर से याचिकाकर्ता को गिरफ्तार कर लिया गया।

न्यायमूर्ति अभय एस ओका और उज्जवल भुइयां की पीठ ने कहा कि यूएपीए का आरोप पुलिस ने उसके 2 जनवरी के अंतरिम जमानत आदेश को विफल करने के इरादे से जोड़ा था। कोर्ट ने एक कंटेट राइटर मनीष राठौड़ द्वारा दायर अपील पर सुनवाई करते हुए तल्ख टिप्पणी की।

पीठ ने कहा कि यह बिल्कुल साफ है कि अपीलकर्ता को केवल दो जनवरी के आदेश को फेल करने के लिए गिरफ्तार किया गया था। जबकि वह जमानत का हकदार है। अपील की अनुमति दी गई। उसे जमानत पर रिहा किया जाएगा। पुलिस ने अपीलकर्ता के खिलाफ जल्दबाजी में यह कार्रवाई इसलिए की थी ताकि उसे हिरासत में ले लिया जाए और दो जनवरी का अंतरिम आदेश रद्द कर दिया जाए।

पीठ ने पुलिस अफसर के आचरण की निंदा की और इसे अनुचित बताया। साथ ही अदालत के आदेश की अवमानना करने पर कार्रवाई की चेतावनी दी। पीठ ने छत्तीसगढ़ पुलिस के वकील से कहा कि पुलिस अधिकारी का यह कृत्य अनुचित है। हम अदालत की आपराधिक अवमानना के लिए कार्रवाई शुरू करने में संकोच नहीं करेंगे। उन्हें अदालत के आदेश की जानकारी थी।

इस पर वकील ने कहा कि आरोपी पहले ही जमानत पर छूट चुका है और इसके पर्याप्त साक्ष्य हैं कि वह नक्सल गतिविधियों में शामिल था। इसके बाद अदालत ने अंतरिम सुरक्षा के अपने आदेश को पूर्ण बना दिया और आरोपी को जमानत दे दी। कंटेट राइटर मनीष राठौड़ ने सुप्रीम कोर्ट में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के एक आदेश को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने उन्हें हत्या के मामले में अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया था। हाईकोर्ट ने कहा था कि जांच के दौरान एकत्र की गई सामग्री से पता चलता है कि हत्या में उसकी संलिप्तता थी और उसका आपराधिक रिकॉर्ड था।

 

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